अश्लील भोजपुरी फिल्मो से भोजपुरी संस्कृति का अंदाज़ा न लगाए।

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जी हां। ये अश्लील भोजपुरी फिल्मे पूर्वांचल की संस्कृति का प्रतिनिध्त्वि नहीं करती। इनका वहाँ के रहन सहन से या रीती रिवाज़ से कोई ज्यादा गहरा नाता नहीं हैं। सबसे पहले आपको बताते हैं भोजपुरी फिल्मो की शुरुवात कैसे हुई। 1960 के दशक में, भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से, बॉलीवुड अभिनेता नाजीर हुसैन ने मुलाकात की। श्री राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें भोजपुरी में एक फिल्म बनाने के लिए कहा, और उसके बाद 1963 में पहली भोजपुरी फिल्म रिलीज हुई। “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो” भोजपुरी की पहली फिल्म थी। लोगो ने फिल्म को बहुत सराहा। ‘बिदेसिया’ और ‘गंगा’ जैसी भोजपुरी फिल्मे, जिसके निर्देशक कुंदन कुमार जी थे , बहुत ही लोकप्रिय साबित हुई।


उसके बाद 70 के दशक में भोजपुरी फिल्मो का निर्माण लगभग बंद हो गया। फिर 80 के दशक में ‘माई ‘ और ‘हमार भौजी ‘ जैसी फिल्मो ने थोड़ी बहुत सफलता हासिल की। 1982 में गोविन्द मुनीस द्वारा निर्देशित फिल्म ‘नदिया के पार ‘ जो की एक हिंदी-भोजपुरी फिल्म थी, बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। लेकिन बाकी फिल्मो को ख़ास सफलता नहीं मिलने के कारण 1990 तक भोजपुरी इंडस्ट्री पूरी तरह से समाप्त हो चुकी थी।

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2001 में रवि किशन अभिनीत ‘सइयां हमार ‘ से फिर से इस इंडस्ट्री की शुरुवात हुई। इसके बाद कई सारी सफल फिल्मो का निर्माण हुआ। मनोज तिवारी अभिनीत ‘ससुरा बड़ा पैसावाला ‘, ने कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। फिर क्या था, लगातार एक के बाद एक फिल्मे बनने चालु हो गए। जिसके पास भी पैसा था वो प्रोडूसर, जो थोड़ा पॉपुलर था वो एक्टर और मुंबई की फिल्मो में स्पॉटबॉय से लेकर सीरियल के असिस्टेंट डायरेक्टर्स तक, निर्देशक बनने लगे। निर्देशक एक फिल्म का जन्मदाता होता हैं… फिल्म भी वैसी ही बनेगी जैसी निर्देशक की कल्पना होगी। लेकिन विश्वास कीजिये साहब , आपको भोजपुरी के गलियारों में ऐसे ऐसे निर्देशक मिल जायँगे , जिन्हे फिल्म निर्माण की बेसिक जानकारी भी नहीं हैं। इनका मकसद फिल्म में अपना नाम एक निर्देशक के तौर पे देखना ही होता हैं। और इनके आका होते हैं निर्माता, जिन्हे सिर्फ प्रॉफिट से मतलब हैं। और हीरो- हीरोइन , उन्हें लगातर फिल्मे करना हैं और पैसे बनाने हैं। एक्टिंग?… वो किस चिड़िया का नाम हैं?
कहानी, तकनिकी या किसी भी गुणवत्ता से किसी का कोई सरोकार नहीं… भाई, पॉपुलरिटी और पैसे मिले तो क्वालिटी की किसको पड़ी हैं। यही कारण हैं की पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से बहुत दूर हैं… और उन्हें भोजपुरी से ज्यादा हिंदी या सॉउथ की या हॉलीवुड फिल्मे ज्यादा पसंद हैं। जब तक भोजपुरी इंडस्ट्री शिक्षित वर्ग को आकर्षित नहीं करती , शायद इसे दूसरे फिल्म इंडस्ट्रीज जितना सम्मान नहीं मिलेगा। आज भोजपुरी फिल्मे और गाने अश्लीलता का प्रयाय मात्र बन के रह गए हैं।

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